‘घटि घटि गोरख कहै कहाणी। कांचे भांडै रहे न पाणी॥’

परमात्मा तो बरसने को तत्पर है, लेकिन अगर तुम कच्चे घड़े हो, तो सम्हाल न पाओगे।

परमात्मा बहुत रूपों में तुम्हारे पास आता है, मगर तुम पहचान नहीं पाते—कच्चे भांडै! कैसे पकोगे? अग्नि से गुजरना होगा। इसलिये सदियों-सदियों में संन्यास का जो रंग चुना गया—गैरिक—उसका कारण इतना ही था, वह अग्नि का रंग है। अग्नि से गुजरना होगा, साधना से गुजरना होगा, तो सधोगे, तो पकोगे। साधना तुम्हारे भीतर कच्चे घड़े को पकाने का उपाय है।

.

घटि घटि गोरख कहै कहाणी। कांचै भांडै रहे न पाणी॥

.

गोरख कहते हैं: मैं तो पुकारता हूं, मैं तो बरस उठता हूं। मगर कच्चे घड़े हैं, उनमें पानी टिकता नहीं। इसलिये तो जीवन में कोई रसधार नहीं बहती। और जहां जीवन में कोई रसधार नहीं, गीत नहीं, वहां परमात्मा के प्रति धन्यवाद का तो सवाल कैसे उठेगा? धन्यवाद तो केवल वे ही दे सकते हैं जो धन्यभागी हैं। और धन्यवाद ही प्रार्थना है और धन्यवाद ही पूजा है।

.

यहां भी तू,वहां भी तू, जमीं तेरी, फलक तेरा,

कहीं हमने पता पाया न हरगिज आज तक तेरा।

बात विरोधाभासी है—कि सब जगह है और उसका पता कहीं मिलता नहीं। उसका प्राथमिक अनुभव स्वयं के भीतर होता है, वहां से पता मिलता है। और जिसे वहां पता मिल गया, फिर उसे सब जगह उसका पता मिल जाता है!



13323351_1777167535849042_3047131055058736841_o

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s