क्षण-क्षण

 

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Silence is not empty!

जीवन योजना बद्ध नहीं है। और यही एक मात्र ढंग है, जीवंत होने का।

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संपूर्ण अनियोजित, भविष्‍य के संबंध में बिलकुल अनभिज्ञ–यहां तक कि अगले क्षण के संबंध में भी।

आज पर्याप्त है–वास्तव में आवश्यकता से अधिक पर्याप्त । जो क्षण वर्तमान है वही केवल जीवंत क्षण है–अतीत मृत है इस अर्थ में कि वह अब नहीं है और भविष्य भी मृत है इस अर्थ में कि वह अभी जन्मा ही नहीं है।

और इस तरह अतीत से संबंधित होना, मृत होना है और भविष्य से संबंधित होना भी, मृत होना ही है।

यहीं और अभी, जीवंत हॊने का एक मात्र उपाय– क्षण में होना, पूर्णरूपेण उसमें ही होना।

क्षण-क्षण जीते हुए उस परम सुख को पाया जा सकता है जो कि इस जगत का बिल्कुल भी नहीं है।

एक क्षण समग्रता से जीना ही समय का अतिक्रमण कर जाना है।

और दो क्षणों के बीच बन जाता है एक अंतराल।

और यदि कोई इस अंतराल में ठहर सके तो वह मृत्यु के पार हो जाता है।

क्योंकि समय ही मृत्यु है और समय शून्यता ही जीवन है।

जीवन में ठहरा हुआ कुछ भी नहीं है–वह तो जीवंत है–एक प्रक्रिया–नदी की भांति–सदैव अज्ञात की ओर बहती हुई–ज्ञात तटों से अज्ञात तटों की ओर।

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‘घटि घटि गोरख कहै कहाणी। कांचे भांडै रहे न पाणी॥’

परमात्मा तो बरसने को तत्पर है, लेकिन अगर तुम कच्चे घड़े हो, तो सम्हाल न पाओगे।

परमात्मा बहुत रूपों में तुम्हारे पास आता है, मगर तुम पहचान नहीं पाते—कच्चे भांडै! कैसे पकोगे? अग्नि से गुजरना होगा। इसलिये सदियों-सदियों में संन्यास का जो रंग चुना गया—गैरिक—उसका कारण इतना ही था, वह अग्नि का रंग है। अग्नि से गुजरना होगा, साधना से गुजरना होगा, तो सधोगे, तो पकोगे। साधना तुम्हारे भीतर कच्चे घड़े को पकाने का उपाय है।

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घटि घटि गोरख कहै कहाणी। कांचै भांडै रहे न पाणी॥

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गोरख कहते हैं: मैं तो पुकारता हूं, मैं तो बरस उठता हूं। मगर कच्चे घड़े हैं, उनमें पानी टिकता नहीं। इसलिये तो जीवन में कोई रसधार नहीं बहती। और जहां जीवन में कोई रसधार नहीं, गीत नहीं, वहां परमात्मा के प्रति धन्यवाद का तो सवाल कैसे उठेगा? धन्यवाद तो केवल वे ही दे सकते हैं जो धन्यभागी हैं। और धन्यवाद ही प्रार्थना है और धन्यवाद ही पूजा है।

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यहां भी तू,वहां भी तू, जमीं तेरी, फलक तेरा,

कहीं हमने पता पाया न हरगिज आज तक तेरा।

बात विरोधाभासी है—कि सब जगह है और उसका पता कहीं मिलता नहीं। उसका प्राथमिक अनुभव स्वयं के भीतर होता है, वहां से पता मिलता है। और जिसे वहां पता मिल गया, फिर उसे सब जगह उसका पता मिल जाता है!



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॥ॐ नम: शिवाय॥

 

 

13323351_1777167535849042_3047131055058736841_oशुभ-प्रभात॥


कल १८/०८/२०१६, हमारे फूफा जी, पंडित वासुदेव प्रसाद तिवारी जी के इकलौते सुपुत्र पण्डित श्याम विनोद तिवारी जी (मनवाड़ा, बाबई, होशंगाबाद) के अंतिम संस्कार में राजघाट होशंगाबाद में सम्मिलित हुए।

ईश्वर से उनकी आत्मा की सद्गति की प्रार्थना करते हैं।

॥राम॥